Wednesday, February 28, 2018

जादू

एक उम्र वो थी कि जादू में भी यक़ीन था,
एक उम्र ये है कि हक़ीक़त पर भी शक़ है..

हौसला

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल...
हार जाने का हौसला है मुझे..

Tuesday, February 6, 2018

जादू

एक उम्र वो थी कि जादू में भी यक़ीन था,
एक उम्र ये है कि हक़ीक़त पर भी शक़ है..

Sunday, February 4, 2018

अपने

फिर से सो जा ऐ दिल क्योंकि
धुन्ध बहुत है तेरे शहर में,

अपने दिखते नहीं हैं और
जो दिखते है वो अपने नहीं है.

Friday, January 26, 2018

बेनकाब

बख्शे हम भी न गए बख्शे तुम भी न जाओगे,
वक्त जानता है हर चेहरे को बेनकाब करना।

Saturday, January 20, 2018

वक्त

वक्त को भी हुआ है जरुर किसी से इश्क,
जो वो बेचैन है इतना कि ठहरता ही नहीं...

Saturday, January 13, 2018

हवा

डोर, चरखी, पतंग सब कुछ था;
बस उसके घर की तरफ़ हवा न चली....

Wednesday, December 27, 2017

दूरी

मैं दिसंबर तू जनवरी,
रिश्ता नजदीक का,
दूरी सालभर की।

Saturday, December 16, 2017

खुद में, खुद से,

*भीड़ में कहीं खो सी गयी, हस्ती हमारी है..,*

*खुद में, खुद से, खुद को, ढूँढने की जंग जारी है...*

Tuesday, December 12, 2017

दरवाज़े

हर रिश्ता दरवाज़े खोल जाता है,
या तो दिल के, या तो आँखो के...

Friday, December 8, 2017

पुरानी तमन्ना

पलक से पानी गिरा है, तो उसको गिरने दो..
कोई पुरानी तमन्ना पिघल रही होगी..

Saturday, December 2, 2017

Mind

Your body can stand almost anything. It's your mind that you have to convince.

Thinking

Thinking is difficult, that's why most people judge.

Sunday, November 19, 2017

ग़म

ग़म तो जनाब फ़ुरसत का शौक़ है,

ख़ुशी में वक्त ही कहाँ मिलता है।

चुभते है

टूटे तो, बड़े चुभते है;
क्या काँच,क्या रिश्ते...!!!!

Wednesday, November 1, 2017

झूठ

वो पैरवी तो झूठ की करता चला गया,
लेकिन उसका चेहरा उतरता चला गया।

- वसीम बरेलवी

Saturday, October 28, 2017

ख्वाहिशें

हमारी ख्वाहिशें ही हमारा सुकून निगल गई,
और शिकायत हम किस्मत से कर रहे है।

Tuesday, October 24, 2017

गुस्ताखियां

एक उम्र गुस्ताखियों के लिये भी नसीब हो...

ये ज़िंदगी तो बस अदब में ही गुज़र गई..!

उम्र की ऐसी की तैसी..!

घर चाहे कैसा भी हो..
उसके एक कोने में..
खुलकर हंसने की जगह रखना..

सूरज कितना भी दूर हो..
उसको घर आने का रास्ता देना..

कभी कभी छत पर चढ़कर..
तारे अवश्य गिनना..
हो सके तो हाथ बढ़ा कर..
चाँद को छूने की कोशिश करना.

अगर हो लोगों से मिलना जुलना..
तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..

भीगने देना बारिश में..
उछल कूद भी करने देना..
हो सके तो
एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..

कभी हो फुरसत, आसमान भी साफ हो..
तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना..
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..

घर के सामने रखना एक पेड़..
उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य सुनना..

घर चाहे कैसा भी हो..
घर के एक कोने में..
खुलकर हँसने की जगह रखना.

चाहे जिधर से गुज़रिये
मीठी सी हलचल मचा दिजिये,

उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है
अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.

ज़िंदा दिल रहिए जनाब,
ये चेहरे पे उदासी कैसी
वक्त तो बीत ही रहा है,

उम्र की ऐसी की तैसी..!

Tuesday, September 5, 2017

तमाशा

होने दो तमाशा मेरी भी ज़िन्दगी का,
मैंने भी मेले मैं बहुत तालियाँ बजाई हैं.